Jaikara Door Bell

Jaikara Door Bell with extra courier charges.

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अमृत वेला मुबारक हो गुरमुखो।
28/07/2025

अमृत वेला मुबारक हो गुरमुखो।

🚩[ श्री सद्गुरु देवाय नम: ]🚩       ❤(दिल•की•बात)❤           "सत्संग प्रेमियों",  परमात्मा के प्रेम को तुम खोजना चाहते हो...
26/06/2025

🚩[ श्री सद्गुरु देवाय नम: ]🚩
❤(दिल•की•बात)❤

"सत्संग प्रेमियों", परमात्मा के प्रेम को तुम खोजना चाहते हो पर उसकी ओर सदा पीठ करे खङे रहते हो। प्रेम केवल पात्र को ही मिलता है, अपात्र को नहीं। इसलिए प्रेम सदा यह पूछता है कि "कौन"? तुम प्रेम तो सभी से चाहते हो पर प्रेम के योग्य नहीं बनते। इसी कारण जीवन बिन प्रेम के रूखा ही बीत जाता है। तुम चाहते तो हो कि प्रेम रूपि अमृत रस बरसे लेकिन तुम्हारा पात्र अमृत को संभालने योग्य नहीं है। चाहते विराट को हो लेकिन भीतर जगह क्षुुद्र के लिए भी नहीं है। बुलाते परमात्मा को हो पर उसके लिए घर साधारण मेहमान का ही बनाया है। उसे चाहने से पहले अपने आप को तैयार तो करना ही पङेगा। तुम उसको पाने की विधियां पूछते हुए घूमते रहते हो। अगर विधि काम नहीं कर रही तो तुम विधि बदलने को तैयार हो जाते हो। शास्त्र व धर्म बदलने को तैयार हो। कुछ तो गुरू भी बदल लेते हैं। लेकिन खुद को बदलने का प्रयास नहीं करते जी प्रेमियों।
कुछ लोग कहते हैं कि हम अनेक गुरूओं के पास गए हैं। अनेक आश्रमों में गये हैं। इस गुरू से उस गुरू के पास गए हैं, लेकिन कुछ नहीं हुआ। मगर खुद से एक जरूरी सवाल यह नहीं पूछते कि कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारी पात्रता में ही दोष हो? सत्य तो यह है कि तुम मांगते तो हो पर कभी खुद को उस योग्य बनाते ही नहीं। याद रहे कि बिना योग्यता के कुछ मिल ही नहीं सकता। दरवाजे बन्द करके सूरज को पुकारते हो। बन्द आंखों से मंजिल देखना चाहते हो। इसी लिए तुमसे पूछा जाता है कि तुम कौन हो? इसीलिए द्वार खटखटाते हुए घूम रहे हो। अपनी पहचान एक सही पात्र वाली बना लोगे तो कोई यह नहीं पूछेगा कि तुम कौन हो। फिर प्रेम को तलाशना नहीं पङेगा। प्रेमसागर में डुबकी लग जाएगी। फिर मालिक की तरफ पीठ करके खङे नहीं रहोगे। आमने सामने साक्षात दर्शन होंगे जी दयालु गुरमुख प्रेमियों।
दासनदास की सप्रेम जय सच्चिदानंद जी।
प्रेम, ध्यान, आनंद व सत्संग की बात -
Dil Ki Baat Satsang Ke Saath
🚩From Shri Prayag Dham🚩

🚩[ श्री सद्गुरु देवाय नम: ]🚩       ❤(दिल•की•बात)❤         "सत्संग प्रेमियों",   महापुरुषों के अनुसार, गुरु हमारे भविष्य ...
23/05/2025

🚩[ श्री सद्गुरु देवाय नम: ]🚩
❤(दिल•की•बात)❤

"सत्संग प्रेमियों", महापुरुषों के अनुसार, गुरु हमारे भविष्य की घोषणा है। गुरु का ठीक अर्थ है कि परमात्मा का तो हमें पता नहीं है, लेकिन जिसमें से हमें परमात्मा की पहली झलक मिली हो वही गुरु है। गुरु का मतलब ही इतना है कि जिसके माध्यम से हमें पता चल सके कि जगत में परमात्मा की ही सब लीला है। गुरु का अर्थ शिक्षक नहीं है। समझाने या बताने वाला नहीं। गुरु का अर्थ है कि जिसने बता दिया हो। उसके होने मात्र से ही हमें सुखद एहसास और विशेष सुगंध मिलती है, जो कि भीतर तक उतर जाती है। गुरदर्शन से हमें गुरु का स्पर्श महसूस होता है और हम भीतर से गदगद हो उठते हैं। उसके पावन दर्शन पाकर हमारे जीवन का दृष्टिकोण ही बदल जाता है। इस जीवन को देखने व समझने के अंदाज ही बदल जाते हैं जी प्रेमियों।
ध्यान रहे कि परमात्मा के अस्तित्व की तरफ पहली बार दृष्टि गुरु के माध्यम से ही जा पाती है। इसलिए गुरु पहली ही नजर में जीवन के लिए अर्थपूर्ण मालूम पड़ते हैं। गुरु हमारे लिए महत्वपूर्ण इसलिए है कि वह हमारे भविष्य की घोषणा भी है। जो कल हमने बनना है, गुरु उस कल की घोषणा आज है। आपके भविष्य में जो कल होना है, गुरु उसके लिए आज है। अपने भविष्य की रूपरेखा का हमें कुछ अता पता ही नहीं होता। लेकिन गुरु का स्मरण करते ही सब तय हो जाता है। गुरु ही आपकी जीवन ऊर्जा के बहने के लिए मार्ग बनाएगा। गुरु आपको सही मार्ग पर चलाने के लिए राह में अवरोधक भी लगाएगा, ताकि अवरोधक को भी आप पार कर सको। गुरु आपको सुंदर जीवन जीने के लिए सत्संग, सेवा, सुमिरन, ध्यान जैसे पावन नियमों की सौगात भी देंगे जी दयालु गुरमुख प्रेमियों।
दासनदास की सप्रेम जय सच्चिदानंद जी।
प्रेम, ध्यान, आनंद व सत्संग की बात-
Dil Ki Baat Satsang Ke Saath
🚩From Shri Prayag Dham🚩

🚩[ श्री सद्गुरु देवाय नम: ]🚩       ❤(दिल•की•बात)❤        बच्चे मन के सच्चे सारे जग की आंख के तारे।ये वो नन्हें फूल हैं ज...
22/04/2025

🚩[ श्री सद्गुरु देवाय नम: ]🚩
❤(दिल•की•बात)❤

बच्चे मन के सच्चे सारे जग की आंख के तारे।
ये वो नन्हें फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे।
"सत्संग प्रेमियों", बच्चे शायद किसी बड़े स्वर्ग में रहते होंगे। वे कितने निर्मल, स्वच्छ व पावन स्वरूप में इस धरती पर आते हैं। वे हमारे बीच स्वर्ग की दुनिया की तरह जीना चाहते हैं। पर हम उन्हें सिखा पढ़ा कर उनका स्वर्ग छीन लेते हैं। हम सब भी तो खो देते हैं अपने स्वर्ग को। लेकिन कितने लोग उस स्वर्ग को वापस पा लेते हैं? संत महापुरुष फरमाते हैं कि अगर मरते मरते भी कोई फिर से बच्चा हो जाए, तो स्वर्ग वापिस लौट सकता है। अगर बुढ़ापे में भी आप बच्चों की आंखों से यह दुनिया देख सकें तो सच्चे आनंद व सच्ची खुशी का अनुभव अवश्य प्राप्त कर लेंगे जी गुरमुखो।
महापुरुषों के अनुसार, चेतना की कोई उम्र नहीं होती। आपकी चेतना कभी भी 5 साल या 50 साल की नहीं हो सकती। इस उम्र को तो हम तय करते हैं कि अब मैं 50 का हूं और अब मैं 60 का होने वाला हूं। अगर भीतर से अपनी आंख बंद करके पता लगाए कि मेरी उम्र क्या है तो नहीं पता चल सकेगा। उम्र तो बाहरी कैलेंडर दिन, महीने, साल होते हैं। फरमाया यह है कि तुम्हारे भीतरी स्वरूप की कोई आयु नहीं होती। तुम्हारी चेतना बच्चों की भांति निर्मल है, जिस को वर्षों से नहीं नापा जा सकता। अच्छा यही होगा कि अपनी बाहरी स्मृति से खाली होकर अपने चेतन स्वरूप में उतरना सीखो। इसके लिए श्री सतगुरु देव हमें सत्संग, सेवा, सुमिरन व भजन ध्यान का रास्ता दिखाते हैं जी दयालु गुरमुख प्रेमियों।
दासनदास की सप्रेम जय सच्चिदानंद जी।
प्रेम,ध्यान,आनंद व सत्संग की बात-*l
Dil Ki Baat Satsang Ke Saath
From Shri Prayag Dham

🚩[ श्री सद्गुरु देवाय नम: ]🚩       ❤(दिल•की•बात)❤        "सत्संग प्रेमियों",  बच्चे की आंख में भोला पन क्यों होता है? बच...
27/03/2025

🚩[ श्री सद्गुरु देवाय नम: ]🚩
❤(दिल•की•बात)❤

"सत्संग प्रेमियों", बच्चे की आंख में भोला पन क्यों होता है? बच्चों को चीजें देखते हुए देखना कभी। हमारे और बच्चों के देखने में बहुत फर्क है। हमारा देखना चीज में भी किसी और चीज को देखना है। हम हर समय कुछ खोज रहे हैं व बच्चा सिर्फ देख रहा है। उसे जो जैसा दिखाई पड़े, वो वैसा ही सही है। उसकी उस पर कोई खोज नहीं है। उसकी आंख घूम रही है और देख रही है। उसकी कोई पकड़ नहीं कि फलां चीज देखनी ही है। वह यह भी नहीं चाहता कि फलां चीज दिखे तो ऐसी दिखे। वह जो भी देख रहा है, बस वही ठीक है। इस बात को ऐसे भी कहा जा सकता है कि बच्चे के देखने में कोई प्रयोजन - Purpose नहीं है। वह किसी भी प्रयोजन से नहीं देखता, इसी लिए उसकी आंखों में सदैव भोलापन है। बड़ों की आंख से भोलापन खो जाता है। क्योंकि बड़े की आंख में प्रयोजन आ जाता है। वह हर समय हर चीज को प्रयोजन से देखता है जी प्रेमियों।
जेब भरी हो तो यह आदमी और तरह से देखता है। जेब खाली हो तो और तरह से देखने लगता है। किसी से कुछ काम हो तो और तरह से देखता है और काम नहीं हो तो फिर और ही तरह से देखता है। आदमी के देखने तक में ही प्रयोजन घुसा रहता है। वह हर तरफ ही कुछ खोज रहा है। महापुरुष यह फरमाते हैं कि अगर तुम्हारे देखने में कोई भी प्रयोजन है, कोई भी आकांक्षा है, देखने में अगर कहीं भी तुम्हारा मन है तो तुम्हारा देखना विकृत हो जाता है। ध्यान रहे कि बिना मन के देखना ही देखने की परम स्थिति होती है। उसमें फिर बच्चे जैसा भोलापन होगा। इसलिए बिना मन के ही देखना चाहिए । See without the mind. फरमाते हैं कि सब प्रयोजन, सब भय, इच्छाएं व वासनाएं तुम्हारे मन में ही इकट्ठी होती हैं। इसलिए तुम्हारा भोला पन खो जाता है। भोला पन खोकर तुम मन से सतगुरु का सत्संग, सेवा, सुमिरन, भजन ध्यान कैसे करोगे जी दयालु गुरमुख प्रेमियों?
दासनदास की सप्रेम जय सच्चिदानंद जी।
प्रेम, ध्यान, आनंद व सत्संग की बात-
Dil Ki Baat Satsang Ke Saath
🚩From Shri Prayag Dham🚩

14/03/2025

HAPPY HOLI JI GURMUKHO

🚩[ श्री सद्गुरु देवाय नम: ]🚩      ❤(दिल•की•बात)❤           "सत्संग प्रेमियों",  एक बड़ी पुरानी कहानी है‌। नारद जी स्वर्ग...
12/03/2025

🚩[ श्री सद्गुरु देवाय नम: ]🚩
❤(दिल•की•बात)❤

"सत्संग प्रेमियों", एक बड़ी पुरानी कहानी है‌। नारद जी स्वर्ग जा रहे थे। जाते ‌जाते उन्होंने एक बूढ़े सन्यासी से पूछा कि कोई खबर पूछनी या कहनी है भगवान से? बूढ़े सन्यासी ने कहा कि परमात्मा से पूछना कितनी देर और है अब। क्योंकि मैं तीन जन्मों से साधना कर रहा हूं। वह बहुत पुराना तपस्वी था। नारद जी ने कहा जरूर पूछ लूंगा। वहीं पास में एक वृक्ष के नीचे एक जवान तपस्वी इकतारा बजा कर भजन गा रहा था। नारद जी ने उससे भी पूछ लिया कि भाई भगवान से तो कुछ कहना सुनना नहीं है? मैं स्वर्ग जा रहा हूं। जवान साधक अपना भजन गाता रहा। उसने नारद जी की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। जब नारद ने उसे हिला कर पूछा तो उसने कहा, नहीं। मैंने कुछ नही कहना भगवान से। मुझ पर उसकी अपरंपार कृपा है। मुुझे जो चाहिए वह सब मिला हुआ है। मेरी तरफ से भगवान को कुछ मत कहना। अगर हो सके तो मेरा धन्यवाद देना।
भगवान से मिलकर लौटते हुए नारद जी पहले उसी बूढ़े सन्यासी के पास आए। बोले कि आपके लिए हुई थी बात भगवान से। उन्होंने तो फरमाया कि जिस वृक्ष के नीचे तुम बैठे हो, उस वृक्ष के पत्तों जितने जन्म अभी और लगेंगे। यह सुनते ही बूढ़ा सन्यासी भड़क उठा। क्रोध में उस ने अपनी पोथी फैंक दी और माला तोड़ डाली। वह गुस्से में चिल्लाया कि यह तो हद ही कर दी भगवान ने। यह गलत है, ऐसा नहीं हो सकता। मैं तीन जन्मों से तप रहा हूं। फिर नारद जी दूसरे युवक साधक के पास गए। उस से बोले कि यूं तो तूने इनकार किया था, पर मैंने तेरे बारे में भी पूछ ही लिया भगवान से। उसे भी एक वृक्ष के पत्तों जितने जन्म वाली बात बताई। लेकिन वह युवक साधक यह सुनते ही इकतारा बजाते हुए नाचने लगा। वह बोला, यह तो गजब ही हो गया नारद जी। मेरी इतनी पात्रता कहां? मुझ जैसे दासनदास पर इतनी जल्दी कैसे कृपा हो गई?
सिर्फ एक वृक्ष के पत्तों जितने जन्म? वृक्ष तो जंगल में अनेक हैं। बस इतने कम जन्मों में ही परमात्मा की कृपा बरस जाएगी! विश्वास नहीं होता। मैं तो धन्य हो गया हूं। वह युवक साधक यूंही नाचते गाते हुए ही वहीं समाधि को उपलब्ध हो गया। जो अनन्त जन्मों में होना था, वह उसी क्षण हो गया। महापुरुष यह फरमाते हैं कि सत्संग, सेवा, सुमिरन व भजन ध्यान दिल से समर्पित होकर किया जाए तो परमात्मा तुम से दूर नहीं है जी दयालु गुरमुख प्रेमियों।
दासनदास की सप्रेम जय सच्चिदानंद जी।
प्रेम, ध्यान, आनंद व सत्संग की बात-
Dil Ki Baat Satsang Ke Saath
🚩From Shri Prayag Dham🚩

.      ❤(दिल•की•बात)❤          "सपनों की दुनिया" "सत्संग प्रेमियों",   एक बार एक आदमी रात को द्वारका में सोया और सपने मे...
26/02/2025

. ❤(दिल•की•बात)❤
"सपनों की दुनिया"
"सत्संग प्रेमियों", एक बार एक आदमी रात को द्वारका में सोया और सपने में कलकत्ता में पहुंच गया। वह वहां जाकर घबरा गया कि घर पर तो मेरी पत्नी बीमार है। मैं अब द्वारका में वापिस कैसे पहुंचूं? कलकत्ता से मैं कौन सी ट्रेन पकड़ूं? टाइम टेबल कहां पर देखूं? अब किस हवाई जहाज को पकड़ूं या फिर कौन सी बस से वापस जाऊं? बेचारा लोगों से पूछने लगा कि मैं द्वारका कैसे जाऊं? कोई बोला कि फलां स्टेशन से गाड़ी पकड़ लो और किसी ने कहा कि टेक्सी स्टैंड पर चले जाओ। यह सब सुन सुन कर वह बड़ी मुश्किल में पड़ गया कि अब कलकत्ता से वापस द्वारका कैसे जाऊं?
पहली बात तो यह कि वह कलकत्ता में है ही नहीं। वह कलकत्ता गया ही नहीं है तो फिर कौन से हवाई जहाज से वापस आए? वह सिर्फ वहां पहुंच गया है सपने में। नींद की बेहोशी में और बुद्धि की कल्पना से पहुंच गया है। अब तो उसको जो भी रास्ता बताया जाएगा, वही झूठा होगा। बेहोशी भरे सपनों में उसके लिए सच्चा रास्ता कोई हो ही नहीं सकता है। महापुरुष यह फरमाते हैं कि जब तक तुम सपनों की दुनिया से जागकर अपनी आत्मिक खोज की वास्तविक यात्रा पर नहीं निकलते, तब तक आवागमन से मुक्ति नहीं मिल सकती। जाग कर चले बिना जीवन का भटकाव जारी ही रहेगा। आवागमन का मतलब ही यही है कि हम परमात्मा के मार्ग से कहीं और भटकते जा रहे हैं । इस चक्कर से निकालने के लिए ही हमें समय के महापुरुष सत्संग, सेवा, सुमिरन और भजन-ध्यान का मार्ग दिखाते हैं जी दयालु गुरमुख प्रेमियों।
दासनदास की सप्रेम शुभ कामनाएं जी।
प्रेम, ध्यान, आनंद व सत्संग की बात-
Dil Ki Baat Satsang Ke Saath
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