15/07/2025
'प्रतिस्पर्द्धा' केवल एक कहानी नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन के अंतर्द्वंद्वों, मानसिक संघर्षों और आत्मबोध की प्रक्रिया का एक दार्शनिक आख्यान है। यह कथा प्रसिद्ध मैथिली कथाकार जगदीश प्रसाद मण्डल की उन सशक्त रचनाओं में से एक है, जिनमें यथार्थ का गहरा रेखांकन, सामाजिक विसंगतियों की परख और आत्मसंवाद की गहराई स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनका उद्देश्य न केवल व्यक्ति को उसकी असफलताओं से बाहर निकालना है, बल्कि आत्मचिंतन की उस यात्रा पर ले जाना है जहाँ वह स्वयं अपने भीतर के उजाले को पहचान सके।
कहानी का केंद्रीय पात्र रामकिशोर एक शिक्षित युवक है, जो दो बार प्रशासनिक परीक्षा में असफल हो चुका है और अब जीवन के प्रति निराश और संशयग्रस्त हो चुका है। उसके भीतर का द्वंद्व—‘या तो हम समय के अनुरूप नहीं हैं या समय हमारे अनुरूप नहीं’—उस सम्पूर्ण युवा वर्ग की पीड़ा का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपनी शिक्षा, योग्यता और श्रम के बावजूद स्थापित व्यवस्थाओं में जगह नहीं पा रहे हैं। यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समकालीन समाज की बेचैनी और टूटन की कथा है।
कथाकार ने जिस सूक्ष्मता से रामकिशोर के मानसिक अवसाद, सामाजिक प्रतिस्पर्धा की कटुता और आत्मविमुखता को चित्रित किया है, वह उनकी रचनात्मक संवेदना और गहरी सामाजिक दृष्टि का परिचायक है। यहाँ प्रतिस्पर्धा केवल परीक्षा की नहीं, बल्कि जीवन के हर स्तर पर छाई हुई एक व्यापक मानसिकता है—व्यक्ति बनाम व्यक्ति, परिवार बनाम परिवार, जाति बनाम जाति—जिसने सामाजिक सौहार्द्र को दीमक की तरह चाट लिया है।
ऐसे समय में जब रामकिशोर जैसे पात्र दिशाहीन हो जाते हैं, तब कथा में प्रवेश होता है गौरीनाथ मास्टर जैसे अनुभवसंपन्न चरित्र का। गौरीनाथ मास्टर न केवल एक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं, बल्कि जीवन के मर्मज्ञ व्याख्याता भी हैं। वे आधुनिकता से विमुख नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी विकृतियों को पहचानने वाले जीवन-द्रष्टा हैं। उनका संवाद—“मनुष्य यदि अपने मन, बुद्धि, विवेक और आत्मा के समन्वय से निर्णय ले, तो वही सच्ची सफलता है”—कथा की आत्मा को स्पष्ट करता है।
गौरीनाथ मास्टर और रामकिशोर के बीच का संवाद एक सामान्य बातचीत नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य संवाद की आधुनिक पुनर्रचना है। यह संवाद पाठक को बार-बार रुक कर सोचने पर विवश करता है। कहानी में ‘चिन्ता’ और ‘चिन्तन’ का भेद केवल शब्दों का नहीं, बल्कि समूचे जीवन-दर्शन का भेद बन जाता है। चिन्ता निरुद्देश्य भटकाव है, जबकि चिन्तन आत्मविकास की दिशा है।
लेखक का मूल उद्देश्य केवल यह बताना नहीं है कि एक युवक कैसे अवसाद से बाहर आता है, बल्कि यह उद्घाटित करना है कि मानव-जीवन में आत्मबोध, विवेक और मूल्यबोध की क्या भूमिका है। कथाकार दिखाना चाहते हैं कि जब समाज दिशाहीन हो, जब प्रतिस्पर्धा केवल लाभ के लिए हो, तब व्यक्ति को बाहर नहीं, भीतर की यात्रा करनी चाहिए। स्वयं की खोज ही जीवन की सबसे बड़ी विजय है।
कहानी की भाषा शैली गूढ़, सौम्य और विचारोत्तेजक है। संवादों में जीवन का लवण है—वे केवल पात्रों के बीच नहीं, पाठक के अंतर्मन से भी होते हैं। कथाकार ने संवादों को इतनी सूक्ष्मता से पिरोया है कि वे पाठकीय चेतना में तरंग की भाँति उतरते हैं। यह कहानी महज एक कथा नहीं, बल्कि एक ‘बोध-कथा’ बन जाती है—जो अध्यात्म और व्यवहार के बीच संतुलन की राह दिखाती है।
अंत में, ‘प्रतिस्पर्द्धा’ उन रचनाओं में एक विशिष्ट स्थान रखती है जो व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण की ओर प्रवृत्त करती हैं। यह कथा यथार्थवादी शैली में दर्शन की पुनर्व्याख्या है। लेखक जगदीश प्रसाद मण्डल ने यहाँ एक समकालीन कथाकार की भूमिका को पार करते हुए एक पथप्रदर्शक का स्वरूप ग्रहण किया है। उनके लेखन की यह विशेषता है कि वे कथा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मूल्यबोध और आत्मबोध का साधन बना देते हैं।
इस प्रकार, ‘प्रतिस्पर्द्धा’ एक आन्तरिक यात्रा की वह गाथा है, जो न केवल रामकिशोर को बदलती है, बल्कि पाठक को भी एक सशक्त आत्मबोध की दिशा में प्रेरित करती है। यही लेखक की मूल भावना है—और यही उनकी साहित्यिक उद्देश्य की पराकाष्ठा।
कथा ‘प्रतिस्पर्द्धा’ पर साहित्यिक टिप्पणी
(मूल कथाकार: जगदीश प्रसाद मण्डल Jagdish Prasad Mandal | हिंदी अनुवाद: पल्लवी मण्डल Pallavi Mandal )