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'प्रतिस्पर्द्धा' केवल एक कहानी नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन के अंतर्द्वंद्वों, मानसिक संघर्षों और आत्मबोध की प्रक्रिया का एक ...
15/07/2025

'प्रतिस्पर्द्धा' केवल एक कहानी नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन के अंतर्द्वंद्वों, मानसिक संघर्षों और आत्मबोध की प्रक्रिया का एक दार्शनिक आख्यान है। यह कथा प्रसिद्ध मैथिली कथाकार जगदीश प्रसाद मण्डल की उन सशक्त रचनाओं में से एक है, जिनमें यथार्थ का गहरा रेखांकन, सामाजिक विसंगतियों की परख और आत्मसंवाद की गहराई स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनका उद्देश्य न केवल व्यक्ति को उसकी असफलताओं से बाहर निकालना है, बल्कि आत्मचिंतन की उस यात्रा पर ले जाना है जहाँ वह स्वयं अपने भीतर के उजाले को पहचान सके।

कहानी का केंद्रीय पात्र रामकिशोर एक शिक्षित युवक है, जो दो बार प्रशासनिक परीक्षा में असफल हो चुका है और अब जीवन के प्रति निराश और संशयग्रस्त हो चुका है। उसके भीतर का द्वंद्व—‘या तो हम समय के अनुरूप नहीं हैं या समय हमारे अनुरूप नहीं’—उस सम्पूर्ण युवा वर्ग की पीड़ा का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपनी शिक्षा, योग्यता और श्रम के बावजूद स्थापित व्यवस्थाओं में जगह नहीं पा रहे हैं। यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समकालीन समाज की बेचैनी और टूटन की कथा है।

कथाकार ने जिस सूक्ष्मता से रामकिशोर के मानसिक अवसाद, सामाजिक प्रतिस्पर्धा की कटुता और आत्मविमुखता को चित्रित किया है, वह उनकी रचनात्मक संवेदना और गहरी सामाजिक दृष्टि का परिचायक है। यहाँ प्रतिस्पर्धा केवल परीक्षा की नहीं, बल्कि जीवन के हर स्तर पर छाई हुई एक व्यापक मानसिकता है—व्यक्ति बनाम व्यक्ति, परिवार बनाम परिवार, जाति बनाम जाति—जिसने सामाजिक सौहार्द्र को दीमक की तरह चाट लिया है।

ऐसे समय में जब रामकिशोर जैसे पात्र दिशाहीन हो जाते हैं, तब कथा में प्रवेश होता है गौरीनाथ मास्टर जैसे अनुभवसंपन्न चरित्र का। गौरीनाथ मास्टर न केवल एक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं, बल्कि जीवन के मर्मज्ञ व्याख्याता भी हैं। वे आधुनिकता से विमुख नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी विकृतियों को पहचानने वाले जीवन-द्रष्टा हैं। उनका संवाद—“मनुष्य यदि अपने मन, बुद्धि, विवेक और आत्मा के समन्वय से निर्णय ले, तो वही सच्ची सफलता है”—कथा की आत्मा को स्पष्ट करता है।

गौरीनाथ मास्टर और रामकिशोर के बीच का संवाद एक सामान्य बातचीत नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य संवाद की आधुनिक पुनर्रचना है। यह संवाद पाठक को बार-बार रुक कर सोचने पर विवश करता है। कहानी में ‘चिन्ता’ और ‘चिन्तन’ का भेद केवल शब्दों का नहीं, बल्कि समूचे जीवन-दर्शन का भेद बन जाता है। चिन्ता निरुद्देश्य भटकाव है, जबकि चिन्तन आत्मविकास की दिशा है।

लेखक का मूल उद्देश्य केवल यह बताना नहीं है कि एक युवक कैसे अवसाद से बाहर आता है, बल्कि यह उद्घाटित करना है कि मानव-जीवन में आत्मबोध, विवेक और मूल्यबोध की क्या भूमिका है। कथाकार दिखाना चाहते हैं कि जब समाज दिशाहीन हो, जब प्रतिस्पर्धा केवल लाभ के लिए हो, तब व्यक्ति को बाहर नहीं, भीतर की यात्रा करनी चाहिए। स्वयं की खोज ही जीवन की सबसे बड़ी विजय है।

कहानी की भाषा शैली गूढ़, सौम्य और विचारोत्तेजक है। संवादों में जीवन का लवण है—वे केवल पात्रों के बीच नहीं, पाठक के अंतर्मन से भी होते हैं। कथाकार ने संवादों को इतनी सूक्ष्मता से पिरोया है कि वे पाठकीय चेतना में तरंग की भाँति उतरते हैं। यह कहानी महज एक कथा नहीं, बल्कि एक ‘बोध-कथा’ बन जाती है—जो अध्यात्म और व्यवहार के बीच संतुलन की राह दिखाती है।

अंत में, ‘प्रतिस्पर्द्धा’ उन रचनाओं में एक विशिष्ट स्थान रखती है जो व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण की ओर प्रवृत्त करती हैं। यह कथा यथार्थवादी शैली में दर्शन की पुनर्व्याख्या है। लेखक जगदीश प्रसाद मण्डल ने यहाँ एक समकालीन कथाकार की भूमिका को पार करते हुए एक पथप्रदर्शक का स्वरूप ग्रहण किया है। उनके लेखन की यह विशेषता है कि वे कथा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मूल्यबोध और आत्मबोध का साधन बना देते हैं।

इस प्रकार, ‘प्रतिस्पर्द्धा’ एक आन्तरिक यात्रा की वह गाथा है, जो न केवल रामकिशोर को बदलती है, बल्कि पाठक को भी एक सशक्त आत्मबोध की दिशा में प्रेरित करती है। यही लेखक की मूल भावना है—और यही उनकी साहित्यिक उद्देश्य की पराकाष्ठा।
कथा ‘प्रतिस्पर्द्धा’ पर साहित्यिक टिप्पणी
(मूल कथाकार: जगदीश प्रसाद मण्डल Jagdish Prasad Mandal | हिंदी अनुवाद: पल्लवी मण्डल Pallavi Mandal )

“आब तोहीं कहह रोहित जे एहेन विचार बेटा-पुतोहुक हेबा चाही? ओ एतबो बुझैले तैयार नइ अछि जे मनुक्खक जीवन बहैत धारक धारा स्वर...
23/06/2025

“आब तोहीं कहह रोहित जे एहेन विचार बेटा-पुतोहुक हेबा चाही? ओ एतबो बुझैले तैयार नइ अछि जे मनुक्खक जीवन बहैत धारक धारा स्वरूप अछि। पाछूसँ अबैत, माने जहिना हिमालय पहाड़सँ निकलैत जलधारा पहाड़सँ निकैल धरतीकेँ चीरैत, माने धार बनबैत, आगू मुहेँ जहिना प्रवाहित होइत एक-दोसर धारक धारामे मिलैत अप्पन पैछला रूप बदलैत अगम समुद्रमे जा मिलैए तहिना ई जीवन छी। हर मनुक्खकेँ माता-पिता जन्म दइ छैथ, पालन-पोषण करैत जवान बनबै छैथ, एतबे भार ने हुनकर भेलैन। मनुक्खक जीवने केते टा होइए। पहिलुका लोकक कहब छेलैन जे मनुक्खक जीवन साए बर्खक होइए मुदा सामाजिक परिवेश आ प्राकृतिक प्रकोप एहेन होइते रहल अछि जे मनुक्खक जीवन दूभर-सँ-दूभर बनि गेल अछि, जइसँ अनेको रोग-वियाधिसँ ओ ग्रसित भऽ गेल अछि। तैठाम साए बरख जीब लेब बाल-बोधक खेल नइ ने छी।”
रूपलाल कक्काक विचारमे रोहित भाय बोहिया गेला, माने भासि गेला। भँसैत रोहित भाय बजला-
“हँ, से तँ ठीके कहै छी, काका!”

रोहित भाइक विचार सुनि रूपलाल कक्काक मन मानि गेलैन जे आब रोहितक मन सुख-दुखसँ हटि समतल भूमिमे पहुँच गेल। बजला-
“रोहित, मन उदास देखै छिअ?”
रोहित भाय बजला- “काका, दिन-राति ऐ शरीरकेँ धुनै छी, मुदा थाहे ने पबै छी जे दुखक अन्त हएत की नहि? सदिकाल कोनो-ने-कोनो भूर फुटले रहैए। केतबो जी-जान सँ ओइ भूरकेँ भरए चाहै छी मुदा ओ भरि नहि पबैए। एकटा भरै छी, दोसर फुटि जाइए। तंग-तंग भेल रहै छी, तँए मन उदास अछि।”
रोहित भाइक विचार सुनि रूपलाल काका बुझि गेला जे रोहित अप्पन जीवनेकेँ नहि बुझि पेब रहल अछि आ जखन से नइ बुझि पबैए तखन जीवनकेँ गतिशील केना बना पौत? रूपलाल काका बजला-
“रोहित, अप्पन इच्छा-शक्तिकेँ जगाबह। जाबे अप्पन इच्छा-शक्ति नहि जगतह ताबे संकल्प-शक्ति नहि जगतह।”
रूपलाल कक्काक विचार सुनि रोहित भाइक मनमे आशा, जीवनक आशा तँ जगलैन मुदा ओ केना जागत से बुझिये ने पेब रहल छला। बजला-
“काका, से केना जगाएब?”

जहिना शिक्षक कोनो छात्रक प्रश्नक जिज्ञासा पेब बुझि जाइ छैथ जे धरतीमे अंकुरण-शक्ति एने किसान ओइमे बीज बुनै छैथ आ समय पेब, माने जेते समयमे कोनो बीज धरतीक रस पेब अपनाकेँ ओइमे समाहित करैत अंकुरैक शक्ति निरमबैत अंकुर रूपमे धरतीसँ ऊपर आबि पौध रूपमे प्रकट होइत अछि, तहिना रोहित भाइक मनमे विचारक शक्ति विचरित भऽ ऊपर अबैत रूपलाल काकाकेँ देखि पड़लैन। बजला-
“रोहित, मनुक्खक भीतर जे अप्पन शक्ति अछि ओइ शक्तिकेँ पहिने जानब अछि। जखन ओइ शक्तिकेँ जानि जाएब तखन ओ शक्ति केना जीवनमे औत तइ दिशामे हर मनुक्खकेँ बढ़बाक चाहिऐन।”

रूपलाल कक्काक विचार रोहित भाय किछु-किछु बुझबो केलैन आ बेसी नहियेँ बुझलैन। नइ बुझब सोभाविके छेलैन किएक तँ जे धरती बर्खाक पानि आ रौदक तापसँ सक्कत बनि गेल रहैए, माने पाथर जकाँ पथरा गेल रहैए ओइ धरतीमे बीज देलासँ अंकुरैक जेहेन रूप धरतीमे चाही ओ समाप्त भऽ गेल रहैए जइसँ बीज या तँ ओहिना-क-ओहिना रहि सड़ि जाइए वा सुखिकऽ शक्तिहीन बनि जाइए जइसँ पौध बनैक शक्तिये क्षीण भऽ जाइए। तहिना मनुक्खोक होइए। जइ मनुक्खमे विचारशीलताक शक्ति, माने भावनाक शक्ति क्षीण भऽ जाइए तइ मनुक्खमे भावशक्तिक अंकुरण क्षमता एतेक क्षीण भऽ जाइए जे नव विचार, माने नव जीवनक विचारक सृजन शक्तिये मृतप्राय भऽ जाइए। जइसँ ओकरामे जीवनक आशे मेटा जाइए, तहिना रोहित भायकेँ सेहो भऽ गेल छैन। ओइ शक्तिकेँ, माने रोहित भाइक नव जीवनक शक्तिकेँ जगबैत रूपलाल काका बजला-
“रोहित, धरतीपर जेते मनुक्ख छैथ, मनुक्खे टा नहि आनो-आनो देहधारी जीव-जन्तु अछि, ओ सभ चाहैए जीवनक सुख प्राप्त कऽ सुखसँ जीवन बिताबी मुदा आन-आन देहधारी जीवक चर्चा छोड़ह, किए तँ ओकरामे ओहन चेतन शक्ति, माने मनुक्ख जकाँ चेतन-शक्ति अछिए नहि, तँए ओकरा लेल अप्पन जीवनकेँ सुखसँ जीब लेब, सम्भवे नइ अछि मुदा मनुक्ख तँ से नहि छी, ओकरामे चेतन-शक्ति अछि! बुधि, विचार, विवेक, आत्मा सभकिछु अछि। सभकिछु रहितो ओ सुषुप्त अवस्थामे अछि तँए अपन शक्तिकेँ बुझिये ने पेब रहल अछि। जखन अप्पन शक्तिकेँ बुझिये ने पेबत तखन ओइ शक्तिक उपयोग केना करत आ सुखमय जीवन केना पौत।”
रूपलाल कक्काक विचार सुनि रोहित भाय बजला- “काका, कने नीक जकाँ बुझा दिअ।”
रोहित भाइक विचार सुनि रूपलाल कक्काक अपने मन गवाही देलकैन जे रोहित बुझए तँ चाहि रहल अछि मुदा चेतन-भूमि तेतेक दबाएल अछि जे ओइठाम तक, माने जैठामसँ चेतन-शक्ति जागत वएह झँपाएल अछि, तँए नीक हएत जे जैठामसँ झँपाएल अछि तइ धरतीपर पहुँच ओइठामसँ सृजन शक्तिकेँ जखन जगाएब तखने रोहित जागि सकैए। रूपलाल काका बजला-
“रोहित, दुनियाँमे चाहे ओ साधु-महात्मा होथि आकि साधारण मनुक्ख, सभकेँ अप्पन-अप्पन जीवन छैन। जखन जीवन छैन तखन प्राण रक्षा आ शरीर रक्षा ले भोजन-वस्त्र-आवास चाहबे करिऐन। बिना भोजनसँ शरीर ठाढ़ केना रहतैन, तहिना बिना वस्त्र आ घरक अभावमे मौसमक जे प्रकोप अछि, माने जाड़, गरमी, बरखा आदि, तइसँ रक्षा केना हेतैन। तँए ई जीवनक मूल आवश्यकता, एकर जरूरत सभकेँ छैन, मुदा यएह जखन भोगक रूपमे जीवनमे उतरैए तखन जीवन बोझिल बनि जाइए, जइसँ जीवनक आवश्यकता बेतहाशा बढ़ि जाइए जेकरा पूर्ति करैमे मनुक्ख परेशान भऽ जाइए। तँए, जीवनकेँ ओही सीमा तक रखैक अछि, माने जीवनकेँ जइ सीमा तक मूल आवश्यकताक पूर्तिक अछि, तही सीमा तक रखने उपयोगी होइए। उपभोगी नइ बनैए। जखन मनुक्ख बनि एहि धरतीपर ठाढ़ छी, तखन जँ बुधि-विवेकक उपयोग नहि करब तखन आन-आन देहधारी जीव-जन्तु आ मनुक्खमे की अन्तर भेल? सभ जनै छी जे तैंतीस करोड़ देहधारी जीवमे मनुक्ख कर्म योनिक मानल जाइए आ बाँकी भोग योनिक।”
नमहर साँस छोड़ैत रोहित भाय बजला- “काका, कनी नीक जकाँ फरिछाकऽ बुझा दिअ।”
रोहित भाइक विचार सुनि रूपलाल कक्काक मन मानि गेलैन जे रोहितक जिज्ञासा जगि रहल अछि तँए जेतेक फरिछाकऽ बाजब ओते रोहितक मनमे गहींर तक पहुँचत। रूपलाल काका बजला-
“रोहित! सुखक खगता सभकेँ अछि, मुदा सुख केना प्राप्त हएत, सुख प्राप्तिक रास्ता की अछि, तैठाम आन-आन जीवक चरचे की जे मनुक्खो नहि बुझि पबै छैथ।”
बिच्चेमे रोहित भाय बजला- “सुखक रास्ता केना नीक जकाँ बुझब, से कनी नीक जकाँ...।”
रूपलाल काका बजला- “रोहित, मनुक्खक भीतर, माने मनुक्खक शरीरक भीतर, असीम शक्ति अछि। मुदा ओ सुषुप्त अवस्थामे अछि, माने सुतल अछि। ओकरा जगबैले पहिने इच्छा-शक्तिकेँ जगबए पड़त। जखन इच्छा-शक्ति जगि जाएत, ऐठाम स्पष्ट बुझि लएह जे इच्छो अनन्त अछि, जे नीको अछि आ अधलो अछि। देखिते छहक जे अपने इच्छा-शक्ति पेब कियो साधु-महात्मा, परमात्मा सेहो बनै छैथ आ कियो चोर-डकैत, उचक्का सेहो बनिते अछि, तँए अप्पन इच्छा-शक्तिकेँ गलत दिशा दिस नहि बहका सही दिशा दिस बढ़बैक अछि। देखिते छहक जे हर मनुक्खकेँ अप्पन-अप्पन इच्छा अछि, तँए एते धियानमे जरूर राखी, माने अप्पन इच्छा ओहन राखी जे दोसराक इच्छाक विपरीत नइ हुअए। जखने से हएत तखने एक-दोसराक बीच विवादो हएत आ दुश्मनियो हेबे करत। जखन मनुक्ख बनि ऐ धरतीपर जन्म लेलौं हेन तखन दोसरसँ प्रेम किए ने करी जे दुश्मन बनि दुश्मनी करी।”
रूपलाल कक्काक विचार सुनि रोहित भाय मुहसँ तँ किछु नहि बजला, जेना भीतरे-भीतर हुनका विचार प्रभावित कऽ रहल छेलैन, मुदा मुड़ी डोलबैत स्वीकार जरूर कऽ रहल छला। रोहित भाइक स्वीकारैत भावकेँ परेख रूपलाल काका आगू बजला-
“रोहित, जखन मनमे इच्छा-शक्ति जगैए तखन नीक-अधलाक विचार करैत ओकरा संकल्प दिस बढ़ाबी। जखन इच्छा-शक्ति संकल्प-शक्ति बनि मनमे जगैए तखन ओ परिष्कार होइत, माने नीकसँ नीक बनैत जीवनमे उतरैए, जइसँ क्रिया शक्तिमे माने काम करैक क्षमतामे सेहो वृद्धि होइए आ विचार-शक्ति एहेन बनि जाइए जे जएह करब सएह बाजब आ जे बाजब से करब, एहेन जीवन बनि जाइए। ओना, इच्छा केतौ बाहरसँ नइ अबैए ओ शरीरक भीतरेसँ अबैए आ प्राण-शक्ति पेब शक्तिशाली बनैए। जखन संकल्प-शक्ति मजगूत बनैए तखन मनुक्खमे बदलाव अबए लगैए। माने, अधलासँ नीक दिस मनुक्ख बढ़ए लगैए। देखल भलेँ नइ हुअ मुदा सुनल आ पढ़ल तँ छहे ने जे आदिम युगक मनुक्ख केना आइ वैज्ञानिक युगमे पहुँच वैज्ञानिक बनि गेल अछि।”
रूपलाल कक्काक मुहसँ ‘आदिम युग’ आ ‘आदिम मनुक्ख’ सुनि रोहित भाय स्वीकार करैत बजला-
“हँ, से तँ भेबे कएल अछि।”
रोहित भाइक स्वीकारोक्तिकेँ परेख रूपलाल काका बजला-
“इच्छा-शक्ति जखन संकल्प-शक्ति बनि मनुक्खक जीवनमे उतरैए तखन धियान-शक्ति, माने एकाग्रताक शक्ति सेहो आबि जाइए जइसँ मनुक्ख अपने-आपकेँ पहचानि अप्पन विपन्नतापर विजय पेब सम्पन्नताक जीवनमे पहुँच जाइए, जइसँ ओकरामे दया, प्रेम, करुणा, श्रद्धा, विश्वास इत्यादि पुष्पित-फलित हुअ लगैए। आइ एतबे बुझह, दोसर दिन आरो कहबह।”

1006म कथा 'विपन्नता' ✍️ Jagdish Prasad Mandal सँ साभार

23/06/2025

coming soon
'गजपट लोक'
✍️Jagdish Prasad Mandal

लोकार्पण:  ाति_दीप_जरय' कथागोष्ठी, केवटना, घोघरडीहा, 28 जून 2025 संयोजक: Narayan Prasad Singh सपना साकार ✍️ Ramchandra R...
12/06/2025

लोकार्पण: ाति_दीप_जरय' कथागोष्ठी, केवटना, घोघरडीहा, 28 जून 2025
संयोजक: Narayan Prasad Singh
सपना साकार ✍️ Ramchandra Ray

1003. झुलनमा पुल- शब्द संख्या: 1826, तिथि: 14 मई 20251004. समाजक गति- शब्द संख्या: 2194, तिथि: 19 मई 2025  1005. बुढ़ापा...
12/06/2025

1003. झुलनमा पुल- शब्द संख्या: 1826, तिथि: 14 मई 2025
1004. समाजक गति- शब्द संख्या: 2194, तिथि: 19 मई 2025
1005. बुढ़ापा- शब्द संख्या: 2072, तिथि: 23 मई 2025
1006. विपन्नता- शब्द संख्या: 1925, तिथि: 27 मई 2025
1007. नारद- शब्द संख्या: 1429, तिथि: 30 मई 2025
1008. समतुल भोजन- शब्द संख्या: 2055, तिथि: 03 जून 2025
1009. कबुतरी दादी- 1009म कथा, शब्द संख्या: 1410, तिथि: 06 जून 2025
1010. निफिकीर काका- शब्द संख्या: 1959, तिथि: 10 जून 2025
1011. जीवनामृत- जारी...
Jagdish Prasad Mandal
पल्लवी प्रकाशन
Umesh Mandal
पल्लवी प्रकाशन बेरमा-निर्मली

08/06/2025

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• गामक सोह- शब्द संख्या: 1465, तिथि: 10 फरवरी 2025
• भीख- शब्द संख्या: 1410, तिथि: 13 फरवरी 2025
• पछुआ गेलौं- शब्द संख्या: 1536, तिथि: 16 फरवरी 2025
• स्वतंत्र व्यक्तित्व- शब्द संख्या: 1988, तिथि: 19 फरवरी 2025
• आँखिक सूत- शब्द संख्या: 1571, तिथि: 24 फरवरी 2025
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• समयक फेड़- शब्द संख्या: 1466, तिथि: 07 मार्च 2025
• श्रद्धा- शब्द संख्या: 1563, तिथि: 10 मार्च 2025
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• मनक शान्ति- शब्द संख्या: 1538, तिथि: 22 मार्च 2025
• मनक प्रसन्नता- शब्द संख्या: 1484, तिथि: 25 मार्च 2025
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• आत्माराम- शब्द संख्या- 1777, तिथि: 13 अप्रैल 2025
• नियति कर्म- शब्द संख्या- 1805, तिथि: 17 अप्रैल 2025
• परिवारक ओभरवाइलिंग- शब्द संख्या: 1942, तिथि: 21 अप्रैल 2025
• जीवन संघर्ष- शब्द संख्या: 1988, तिथि: 25 अप्रैल 2025
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• प्रेम- शब्द संख्या: 1553, तिथि: मजदूर दिवस 2025
• जुगक धरम- शब्द संख्या: 1469, तिथि: 04 मई 2025
• विधवाक बाढ़ि- शब्द संख्या: 1271, तिथि: 07 मई 2025
• अनुराधाक संकल्प- शब्द संख्या: 1330, तिथि: 10 मई 2025
• झुलनमा पुल- शब्द संख्या: 1826, तिथि: 14 मई 2025
• समाजक गति- शब्द संख्या: 2194, तिथि: 19 मई 2025
• बुढ़ापा- शब्द संख्या: 2072, तिथि: 23 मई 2025
• विपन्नता- शब्द संख्या: 1925, तिथि: 27 मई 2025
• नारद- शब्द संख्या: 1429, तिथि: 30 मई 2025
• समतुल भोजन- शब्द संख्या: 2055, तिथि: 03 जून 2025
• कबुतरी दादी- 1009म कथा, शब्द संख्या: 1410, तिथि: 06 जून 2025
• निफिकीर काका- जारी...
Jagdish Prasad Mandal

12/05/2025

रचनाक्रम:✍️Jagdish Prasad Mandal
1227. जिनगीसँ प्रेम, 1228. परिवारे बगैद गेल, 1229. जिनगी पिछैड़ गेल, 1230. श्रमहीन, 1231. समुद्रलंघन, 1232. परिवारक भार, 1233. हीन-हीनाइत विवेक, 1234. चेहराक निखार, 1235. भरि मन काज, 1236. विचारे मरि गेल, 1237. मृत्युक भय मेटा गेल, 1238. घरक बात, 1239. अप्पन दलान, 1240. कंजूसपन, 1241. आएल आशा चलि गेल, 1242. अकारण, 1243. अछोप, 1244. अप्पन बेइमानी, 1245. उनटन, 1246. अर्द्धांगिनी, 1247. बहवाँइर, 1248. पाक मास्टर, 1249. साइंस टीचर, 1250. इज्जत लऽ लेलक, 1251. निसगर पान, 1252. विरोध, 1253. जीवन दान, 1254. बाग-बगिया, 1255. विश्वास पात्र, 1256. विचारक टिटकारी, 1257. लत, 1258. जीवन खटाइमे पड़ि गेल, 1259. कर्ज, 1260. बहादुरी, 1261. हमरो खगता छै, 1262. सपना, 1263. संगे-संग एलौं संगिया मरि गेल हम भुतिआइ छी, 1264. उवाणि, 1265. विचारक प्रबलता, 1266. अपन रचित रचना, 1267. थाहल संगी, 1268. आत्मबल, 1269. विश्वासहीन, 1270. बुलन्दी, 1271. अप्पन साती, 1272. खिच्चड़ि, 1273. भंगतराह कवि, 1274. भंगतराह कवि, 1275. कनियेँ-मनियेँ पूँजी, 1276. पुरुखढौह, 1277. सिमानक झगड़ा, 1278. जिनगी भार बनि गेल, 1279. परिवारक योग, 1280. मनुक्ख खौक, 1281. साहित्यकारक विवेक, 1282. भाषाक बेथा, 1283. बुझबे ने केलिऐ, 1284. जीवनक सम्बन्ध, 1285. गैंचाह लोक, 1286. जिनगीकेँ पटैक भगलौं, 1287. अन्तिम आशा, 1288. गजपट मारि, 1289. कन्हजोड़, 1290. अनहोनी, 1291. होनी, 1292. भवितव्य, 1293. ओसचट बीमारी, 1294. पुत्र परीक्षा, 1295. अप्पन मन बुझाएब, 1296. जड़ौर, 1297. अलोपित, 1298. कुमहरक बतिया, 1299. सिमानक आड़ि, 1300. नव बनक नव फल, 1301. सुमारक, 1302. अन्तिम भेँट, 1303. अनहरिया, 1304. निरन्तर, 1305. शॉर्टकट रास्ता, 1306. अपेछा टुटि गेल, 1307. सुनयना बेटी, 1308. आब नइ जीब, 1309. सेहन्ता सेहन्ते रहि गेल, 1310. धुरफन्ना लोक, 1311. घरदेखी, 1312. बासभूमि, 1313. इज्जतपर पड़ि गेल, 1314. अहीं जीतलौं, 1315. गामसँ गाए उपैट गेल, 1316. भारक बड़बड़िया, 1317. रूपेँ बदैल गेल, 1318. वंशक धर्म, 1319. उपराग, 1320. केकरा भगाउ आ केकरा बसाउ, 1321. खीरा लत्तीमे रोजगार, 1322. टकुआटान, 1323. पोस्टमार्टम, 1324. ऐ सालक नाह बुड़ि गेल, 1325. सामंजस्य, 1326. महींसवारक गाम, 1327. दसअना-छअना, 1328. वाह रे हम, 1329. एक जूम तमाकुल, 1330. चपरासीक गाम, 1331. बनरफाँस, 1332. हँस्सा ठक, 1333. विश्वासू मन, 1334. चोरनी पिल्ली, 1335. गामक जमीने पथरा गेल, 1336. एकलव्यपन, 1337. केलहा साफल, 1338. त्रिशूलपर लटकल गाम, 1339. त्रिशंकु गाम, 1340. चारिम कनियाँ, 1341. वंश नाश, 1342. लोक लाज, 1343. धानक कमठौन, 1344. एक चुटकी खुशी, 1345. अनका सिरे, 1346. समयक फेड़, 1347. कोढ़ि, 1348. मुहाँ-ठुठ्ठी, 1349. औनाकऽ मरए लगलौं, 1350. जेहेन आँखि तेहेन पाँखि, 1351. चौरचनक केरा, 1352. सुख-दुख, 1353. दुख-सुख, 1354. जीवन की आ जीवनक उद्देश्य की, 1355. अंधविश्वास, 1356. बखेरिया लोक, 1357. नव जीवन, 1358. प्रीति, 1359. पुरुषार्थ, 1360. मन टँगि गेल, 1361. नियति आ पुरुषार्थ, 1362. जे ननू से गर्भहि ननू, 1363. पुरुखक डीह, 1364. पाशापर, 1365. संचरण, 1366. कंजूस, 1367. बाबाक पौती, 1368. भँसिया गेलौं, 1369. उबारि देलौं, 1370. श्रद्धा, 1371. केकरोपर आश्रित, 1372. समैया लुच्चा, 1373. उकड़ू समयमे सुकड़ू काज, 1374. मुक्ति, 1375. मोनि फुटल धारमे, 1376. मरैक बाटमे, 1377. सिरगर लोक, 1378. कलछप्पन, 1379. छुट्टा लोक, 1380. उम्रदारक स्वर, 1381. मनुक्खक मोल, 1382. सिर संकोच, 1383. भयक लाज, 1384. तिलवा, 1385. प्रकृतिस्थ, 1386. केकरो आशा, 1387. चोटाएल प्रेम, 1388. जिनगीक थाह, 1389. रिस, 1390. पल-पलक मोल, 1391. धैर्य, 1392. समाजक ऐना, 1393. आँखिक पाँखि, 1394. भुतलाएल जीवन, 1395. अप्पन केलहा, 1396. बाबा हाथक खुरपी, 1397. बतरसिया काका, 1398. हारि जाएब, 1399. संकल्प, 1400. संकल्प शक्ति, 1401. सहयोगी काज, 1402. मुरुखपन, 1403. बजैक मुँह, 1404. बोलकहल बेटी, 1405. नँगरडोलौन धन, 1406. गे मौगी तोरा अँगने कते, 1407. अद्वितीय, 1408. अप्पन घर मूड़ब, 1409. अप्पन सेवा अपने हाथ, 1410. कनगुरिया ओंगरी, 1411. अभावसँ प्रभाव, 1412. तपोभूमि, 1413. पाइ खा गेल, 1414. दुर्दिन, 1415. नजाइज कब्जा, 1416. उरीन, 1417. नोकर नइ छी, 1418. व्यापार, 1419. अठहत्तरिम स्वतंत्रता दिवस, 1420. माइक सोग, 1421. बीस बर्खक बाद, 1422. माइक ममता, 1423. घेरा, 1424. दूगमिया, 1425. सहोदर भाय, 1426. जमुनिया, 1427. अकेलापन, 1428. स्टेट बोरिंग, 1429. अप्पन दुनियाँ, 1430. रौदीक दाही, 1431. की पेलौं, 1432. आमक गाछी, 1433. भुतलाएल जीवन, 1434. पीपरक गाछ, 1435. प्रतिष्ठा पानिमे गेल, 1436. शिवालय, 1437. सुखाइत जीवनमे नव कलश, 1438. मौन, 1439. उनटा बसात, 1440. दू पाटनक बीचमे, 1441. एक्के साधे सब सधे, 1442. विश्व शान्ति, 1443. चानक यात्रा, 1444. बीरान, 1445. बदलैत विचार घटैत आशा, 1446. केकरा-ले केलौं, 1447. सेवा, 1448. दर्शनक दरिद्रता, 1449. बत्तीस दाँत, 1450. सपना, 1451. सुतरल, 1452. परिवर्तन, 1453. दोस्तीक दुर्गति, 1454. देव-दानव, 1455. उरीन, 1456. गामक सोह, 1457. भीख, 1458. पछुआ गेलौं, 1459. स्वतंत्र व्यक्तित्व, 1460. आँखिक सूत, 1461. विचारक मोड़, 1462. धियान, 1463. समयक फेड़, 1464. श्रद्धा, 1465. समाजक शक्ति, 1466. मोहभंग, 1467. मनक शक्ति, 1468. मनक शान्ति, 1469. मनक प्रसन्नता, 1470. झारखण्ड दर्शन, 1471. आत्माराम, 1472. नियति कर्म, 1473. परिवारक ओभरवाइलिंग, 1474. जीवन संघर्ष, 1475. जीवनक उद्देश्य, 1476. प्रेम, 1477. जुगक धरम, 1478. विधवाक बाढ़ि, 1479. अनुराधाक संकल्प, 1480. झुलनमा पुल...

12/05/2025

नियमित लेखन क्रम:✍️Jagdish Prasad Mandal
879. जेहेन आँखि तेहेन पाँखि- शब्द संख्या: 1077, तिथि: 17 सितम्बर 2023
880. चौरचनक केरा- शब्द संख्या: 1185, तिथि: 19 सितम्बर 2023
881. सुख-दुख- शब्द संख्या: 1708, तिथि: 04 अक्टूबर 2023
882. दुख-सुख- शब्द संख्या: 1629, तिथि: 07 अक्टूबर 2023
883. जीवन की आ जीवनक उद्देश्य की- शब्द संख्या: 1571, तिथि: 10 अक्टूबर 2023
884. अंधविश्वास- शब्द संख्या: 1509, तिथि: 13 अक्टूबर 2023
885. बखेरिया लोक- शब्द संख्या: 1528, तिथि: 16 अक्टूबर 2023
886. नव जीवन- शब्द संख्या: 1620, तिथि: 19 अक्टूबर 2023
887. प्रीति- शब्द संख्या: 1610, तिथि: 22 अक्टूबर 2023
888. पुरुषार्थ- शब्द संख्या: 1667, तिथि: 25 अक्टूबर 2023
889. मन टँगि गेल- शब्द संख्या: 1702, तिथि: 28 अक्टूबर 2023
890. नियति आ पुरुषार्थ- शब्द संख्या: 1714, तिथि: 31 अक्टूबर 2023
891. जे ननू से गर्भहि ननू- शब्द संख्या: 1639, तिथि: 03 नवम्बर 2023
892. पुरुखक डीह- शब्द संख्या: 1666, तिथि: 06 नवम्बर 2023
893. पाशापर- शब्द संख्या: 1707, तिथि: 09 नवम्बर 2023
894. संचरण- शब्द संख्या: 1743, तिथि: 14 नवम्बर 2023
895. कंजूस- शब्द संख्या: 1636, तिथि: 17 नवम्बर 2023
896. बाबाक पौती- शब्द संख्या: 1640, तिथि: 20 नवम्बर 2023
897. भँसिया गेलौं- शब्द संख्या: 1614, तिथि: 23 नवम्बर 2023
898. उबारि देलौं- शब्द संख्या: 1645, तिथि: 28 नवम्बर 2023
899. श्रद्धा- शब्द संख्या: 1619, तिथि: 01 दिसम्बर 2023
900. केकरोपर आश्रित- शब्द संख्या: 1641, तिथि: 04 दिसम्बर 2023
901. समैया लुच्चा- शब्द संख्या: 1758, तिथि: 07 दिसम्बर 2023
902. उकड़ू समयमे सुकड़ू काज- शब्द संख्या: 1778, तिथि: 10 दिसम्बर 2023
903. मुक्ति- शब्द संख्या: 1873, तिथि: 14 दिसम्बर 2023
904. मोनि फुटल धारमे- शब्द संख्या: 1853, तिथि: 18 दिसम्बर 2023
905. मरैक बाटमे- शब्द संख्या: 1702, तिथि: 23 दिसम्बर 2023
906. सिरगर लोक- शब्द संख्या: 1725, तिथि: 25 दिसम्बर 2023
907. कलछप्पन- शब्द संख्या: 1894, तिथि: 25 दिसम्बर 2023
908. छुट्टा लोक- शब्द संख्या: 1843, तिथि: 02 जनवरी 2024
909. उम्रदारक स्वर- शब्द संख्या: 2203, तिथि: 06 जनवरी 2024
910. मनुक्खक मोल- शब्द संख्या: 1800, तिथि: 09 जनवरी 2024
911. सिर संकोच- शब्द संख्या: 2044, तिथि: 13 जनवरी 2024
912. डरक लाज- शब्द संख्या: 2021, तिथि: 17 जनवरी 2024
913. तिलवा- शब्द संख्या: 2046, तिथि: 21 जनवरी 2024
914. प्रकृतिस्थ- शब्द संख्या: 1268, तिथि: 23 जनवरी 2024
915. केकरो आशा- शब्द संख्या: 1277, तिथि: 25 जनवरी 2024
916. चोटाएल प्रेम- शब्द संख्या: 1421, तिथि: 28 जनवरी 2024
917. जिनगीक थाह- शब्द संख्या: 2059, तिथि: 01 फरवरी 2024
918. रिस- शब्द संख्या- 1465, तिथि: 04 फरवरी 2024
919. पल-पलक मोल- शब्द संख्या: 1678, तिथि: 07 फरवरी 2024
920. धैर्य: शब्द संख्या- 1391, तिथि: 10 फरवरी 2024
921. समाजक ऐना- शब्द संख्या: 1858, तिथि: 14 फरवरी 2024
922. आँखिक पाँखि- शब्द संख्या: 1474, तिथि: 17 फरवरी 2024
922. भुतलाएल जीवन- शब्द संख्या: 1491, तिथि: 20 फरवरी 2024
922. अप्पन केलहा- शब्द संख्या: 1924, तिथि: 24 फरवरी 2024
922. उपकारक ऋण- शब्द संख्या: 1368, तिथि: 02 मार्च 2024
922. बाबा हाथक खुरपी- शब्द संख्या: 1506, तिथि: 05 मार्च 2024
922. बतरसिया काका- शब्द संख्या: 1404, तिथि: 08 मार्च 2024
922. हारि जाएब- शब्द संख्या: 1431, तिथि: 11 मार्च 2024
922. संकल्प- शब्द संख्या: 1340, तिथि: 14 मार्च 2024
923. संकल्प शक्ति- शब्द संख्या: 1236, तिथि: 17 मार्च 2024
924. सहयोगी काज- शब्द संख्या: 1846, तिथि: 22 मार्च 2024
925. मुरुखपन- शब्द संख्या: 1683, तिथि: 27 मार्च 2024
926. बजैक मुँह- शब्द संख्या: 1316, तिथि: 29 मार्च 2024
927. गीताक ज्ञान- शब्द संख्या: 1362, तिथि: 31 मार्च 2024
928. बोलकहल बेटी- शब्द संख्या: 1687, तिथि: 31 मार्च 2024
929. नँगरडोलौन धन- शब्द संख्या: 1359, तिथि: 05 अप्रैल 2024
930. अहाँक अँगने केते- शब्द संख्या: 1565, तिथि: 08 अप्रैल 2024
931. अद्वितीय- शब्द संख्या: 1379, तिथि: 10 अप्रैल 2024
932. अप्पन घर मूड़ब- शब्द संख्या: 1685, तिथि: 13 अप्रैल 2024
933. अप्पन सेवा अपने हाथ- शब्द संख्या: 1816, तिथि: 20 अप्रैल 2024
934. कनगुरिया ओंगरी- शब्द संख्या: 1878, तिथि: 23 अप्रैल 2024
935. अभावसँ प्रभाव- शब्द संख्या: 1816, तिथि: 26 अप्रैल 2024
936. तपोभूमि- शब्द संख्या: 1339, तिथि: 28 अप्रैल 2024
937. पाइ खा गेल- शब्द संख्या: 1645, तिथि: 24 जुलाइ 2024
938. दुर्दिन- शब्द संख्या: 1512, तिथि: 30 जुलाइ 2024
939. नजाइज कब्जा- शब्द संख्या: 1587, तिथि: 03 अगस्त 2024
940. उरीन- शब्द संख्या: 1785, तिथि: 08 अगस्त 2024
941. नोकर नइ छी- शब्द संख्या: 1379, तिथि: 12 अगस्त 2024
942. व्यापार- शब्द संख्या: 1380, तिथि: 15 अगस्त 2024
943. अठहत्तरिम स्वतंत्रता दिवस- शब्द संख्या: 1899, तिथि: 19 अगस्त 2024
944. माइक सोग- शब्द संख्या: 2086, तिथि: 23 अगस्त 2024
945. बीस बर्खक बाद- शब्द संख्या: 1620, तिथि: 26 अगस्त 2024
946. माइक ममता- शब्द संख्या: 1523, तिथि: 28 अगस्त 2024
947. घेरा- शब्द संख्या: 1309, तिथि: 30 अगस्त 2024
948. दूगमिया- शब्द संख्या: 1427, तिथि: 01 सितम्बर 2024
949. सहोदर भाय- शब्द संख्या: 1950, तिथि: 04 सितम्बर 2024
950. जमुनिया- शब्द संख्या: 1746, तिथि: 07 सितम्बर 2024
951. अकेलापन- शब्द संख्या: 1917, तिथि: 10 सितम्बर 2024
952. स्टेट बोरिंग- शब्द संख्या: 1336, तिथि: 12 सितम्बर 2024
953. अप्पन दुनियाँ- शब्द संख्या: 1407, तिथि: 14 सितम्बर 2024
954. रौदीक दाही- शब्द संख्या: 1872, तिथि: 18 सितम्बर 2024
955. की पेलौं- शब्द संख्या: 1999, तिथि: 23 सितम्बर 2024
956. आमक गाछी- शब्द संख्या: 2248, तिथि: 30 सितम्बर 2024
957. भुतलाएल जीवन- शब्द संख्या: 2418, तिथि: 06 अक्टूबर 2024
958. पीपरक गाछ- शब्द संख्या: 1707, तिथि: 10 अक्टूबर 2024
959. प्रतिष्ठा पानि गेल- शब्द संख्या: 1236, तिथि: 13 अक्टूबर 2024
960. शिवालय- शब्द संख्या: 1731, तिथि: 18 अक्टूबर 2024
961. सुखाइत जीवनमे नव कलश- शब्द संख्या: 1350, तिथि: 21 अक्टूबर 2024
962. मौन- शब्द संख्या: 1477, तिथि: 24 अक्टूबर 2024
963. उनटा बसात- शब्द संख्या: 1392, तिथि: 27 अक्टूबर 2024
964. दू पाटनक बीचमे- शब्द संख्या: 2710, तिथि: 01 नवम्बर 2024
965. एक्के साधे सब सधै- शब्द संख्या: 1893, तिथि: 06 नवम्बर 2024
966. विश्व शान्ति- शब्द संख्या: 1764, तिथि: 11 नवम्बर 2024
967. चानक यात्रा- शब्द संख्या: 1720, तिथि: 16 नवम्बर 2024
968. बीरान- शब्द संख्या: 1327, तिथि: 19 नवम्बर 2024
969. बदलैत विचार घटैत आशा- शब्द संख्या: 1353, तिथि: 22 नवम्बर 2024
970. केकरा-ले केलौं- शब्द संख्या: 1352, तिथि: 25 नवम्बर 2024
971. सेवा- शब्द संख्या: 1368, तिथि: 29 नवम्बर 2024
972. दर्शनक दरिद्रता- शब्द संख्या: 1360, तिथि: 02 दिसम्बर 2024
973. बत्तीस दाँत- शब्द संख्या: 1411, तिथि: 05 दिसम्बर 2024
974. सपना- शब्द संख्या: 2349, तिथि: 14 दिसम्बर 2024
975. सुतरल- शब्द संख्या: 1919, तिथि: 18 दिसम्बर 2024
976. परिवर्तन- शब्द संख्या: 2165, तिथि: 22 दिसम्बर 2024
977. दोस्तीक दुर्गति- शब्द संख्या: 2177, तिथि: 01 जनवरी 2025
978. देव-दानव- शब्द संख्या: 1900, तिथि: 05 जनवरी 2025
979. उरीन- शब्द संख्या: 1375, तिथि: 06 फरवरी 2025
980. गामक सोह- शब्द संख्या: 1465, तिथि: 10 फरवरी 2025
981. भीख- शब्द संख्या: 1410, तिथि: 13 फरवरी 2025
982. पछुआ गेलौं- शब्द संख्या: 1536, तिथि: 16 फरवरी 2025
983. स्वतंत्र व्यक्तित्व- शब्द संख्या: 1988, तिथि: 19 फरवरी 2025
984. आँखिक सूत- शब्द संख्या: 1569, तिथि: 24 फरवरी 2025
984. विचारक मोड़- शब्द संख्या: 1918, तिथि: 28 फरवरी 2025
985. धियान- शब्द संख्या: 1974, तिथि: 04 मार्च 2025
986. समयक फेड़- शब्द संख्या: 1488, तिथि: 07 मार्च 2025
987. श्रद्धा- शब्द संख्या: 1559, तिथि: 10 मार्च 2025
988. समाजक शक्ति- शब्द संख्या: 1617, तिथि: 13 मार्च 2025
989. मोहभंग- शब्द संख्या: 1499, तिथि: 16 मार्च 2025
990. मनक शक्ति- शब्द संख्या: 1463, तिथि: 19 मार्च 2025
991. मनक शान्ति- शब्द संख्या: 1538, तिथि: 22 मार्च 2025
992. मनक प्रसन्नता- शब्द संख्या: 1484, तिथि: 25 मार्च 2025
993. झारखण्ड दर्शन- शब्द संख्या: 2223, तिथि: 08 अप्रैल 2025
994. आत्माराम- शब्द संख्या- 1777, तिथि: 13 अप्रैल 2025
995. नियति कर्म- शब्द संख्या- 1805, तिथि: 17 अप्रैल 2025
996. परिवारक ओभरवाइलिंग- शब्द संख्या: 1942, तिथि: 21 अप्रैल 2025
997. जीवन संघर्ष- शब्द संख्या: 1988, तिथि: 25 अप्रैल 2025
998. जीवनक उद्देश्य- शब्द संख्या: 1455, तिथि: 28 अप्रैल 2025
999. प्रेम- शब्द संख्या: 1553, तिथि: मजदूर दिवस 2025
1000. जुगक धरम- शब्द संख्या: 1469, तिथि: 04 मई 2025
1001. विधवाक बाढ़ि- शब्द संख्या: 1271, तिथि: 07 मई 2025
1002. अनुराधाक संकल्प- शब्द संख्या: 1330, तिथि: 10 मई 2025
1003. झुलनमा पुल- जारी...

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