09/05/2026
उस दिन हम उसी कैंटीन के पास नीम के पेड़ के नीचे बैठ गए। मैंने चाय पीए और चाय उस लड़की ने पिलाई। मैं नहीं चाहता था कि वह पैसे देए लेकिन उसने ही भुगतान किया। मैंने देखा कि उसने अपने बैग या जेब से नहीं, बल्कि रुमाल की एक गांठ खोल कर पैसे नि काले। रुमाल में पैसे एक कोने में बांध कर रखे गए थे। यह देख कर सहज ही
अनुमान लगाया जा सकता था कि उसके पास अधिक पैसे नहीं रहते होंगे, फिर भी उसने चाहा कि मुझे चाय पिलाए।
चाय पिलाने के बाद उसने मुस्करा कर कहा, “मैं यूनिवर्सिटी में किसी को चाय नहीं पिलाती, खुद भी नहीं पीती, लेकिन तुम पीयो।” यह वाक्य मेरे भीतर कुछ देर तक गूंजता रहा। एक और बात मैंने गौर की - वह मुझे कभी ‘आप’ नहीं कहती थी, हमेशा ‘तुम’ ही कहती थी। मुझे थोड़ा अचरज हुआ। मैंने उसे ध्यान से देखा और सहज भाव से कहा, ‘तुम’ शायद ऐसे घर की हो जहां ‘तुम’ कहना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती होगी।”
मुझे याद आया कि मैं भी अपने पिता जी को हमेशा ‘तू’ कह कर बुलाता था । जैसे। “दादा तू कहां जात हौ?” एक बार मेरे फूफा ने टोका था ए “अब तुम पढ़ लिख गए हो, अपने पिता को तुम मत कहा करो।” मैंने प्रयास किया और पिता जी से एक दिन कहा, “आप कहां गए थे?” इस पर उन्होंने नाराज होकर कहा, “एक झापड़ लगाइब त ठीक हो जइबा! पढ़ाई लिखाई देखावत हउवा अपने आप के।” तब से मैंने समझ लिया था कि ‘’तू और ‘तुम’ कहने के पीछे सिर्फ़ संबोधन नहीं, एक आत्मीयता भी छुपी होती है। इसलिए मैं कभी इस बात का बुरा नहीं मानता। खैर, उस दिन मैंने चाय पी, पैसे उसने दिए, फिर मैं अपने कमरे में चला आया।
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