11/08/2026
📚 साहित्य सिर्फ़ शब्दों और भावनाओं का संसार नहीं, समाज के बदलते स्वरूप का आईना भी है।
क्या साहित्य को केवल उसकी ‘साहित्यिकता’ तक सीमित करके देखा जा सकता है? डॉ. मैनेजर पांडेय बताते हैं कि साहित्य की धारणा कोई स्थिर और अपरिवर्तनशील अवधारणा नहीं है। समाज बदलता है, साहित्य बदलता है और उसके साथ साहित्य को देखने-समझने की दृष्टि भी बदलती है।
बालकृष्ण भट्ट के ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’ से लेकर आधुनिक साहित्य की बदलती भूमिकाओं तक, यह विमर्श साहित्य और समाज के गहरे रिश्ते को सामने लाता है।
📖 पढ़िए डॉ. मैनेजर पांडेय का आलेख — ‘साहित्य की नयी धारणा’
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