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जहाँ भारतीय साहित्य अपनी भाषाओं, विचारों और संवेदनाओं के साथ जीवित है।
कविता से विमर्श तक, पढ़ना यहाँ एक अनुभव है।

“पढ़ना ही ज़िंदगी है।”

📚 क्या किसी नगरवधू की कहानी केवल देह की कहानी होती है, या वह समाज, सत्ता, नैतिकता और स्त्री-अस्तित्व के गहरे प्रश्न भी उ...
10/06/2026

📚 क्या किसी नगरवधू की कहानी केवल देह की कहानी होती है, या वह समाज, सत्ता, नैतिकता और स्त्री-अस्तित्व के गहरे प्रश्न भी उठाती है?

कुसुम खेमानी के विचारोत्तेजक लेख ‘कुछ रेत... कुछ सीपियाँ... विचारों की’ में ‘एक नगरवधू की आत्मकथा’ को पढ़ने का अनुभव केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि वैचारिक और भावनात्मक यात्रा बन जाता है। छोटी-सी कृति होने के बावजूद यह पाठक को बार-बार अपनी ओर खींचती है, क्योंकि इसमें स्त्री के उस स्वर को सुनने का अवसर मिलता है जिसे समाज अक्सर सुनना नहीं चाहता।

लेख यह प्रश्न उठाता है कि क्या शरीर, इच्छा, सौंदर्य और अनुभव भी उतने ही सत्य हैं जितने हमारे आदर्श, सिद्धांत और नैतिक मानदंड? नगरवधू का चरित्र अपने अस्तित्व को किसी अपराधबोध के साथ नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और स्वीकृति के साथ प्रस्तुत करता है। यही साहस इस कृति को विशिष्ट बनाता है। साधारण शब्दों में रची गई यह कथा स्त्री-अनुभव, सामाजिक दृष्टि और मानवीय जटिलताओं पर गंभीर विमर्श की जमीन तैयार करती है।

✨ क्या साहित्य का काम केवल नैतिक निर्णय देना है, या जीवन के उन पक्षों को भी सामने लाना है जिन्हें हम देखने से बचते हैं? अपनी राय साझा करें।

📖 पढ़िए ‘कथा : नगरवधू की’ और इस अनोखे साहित्यिक संवाद का हिस्सा बनिए।

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📖 कभी-कभी अंधेरा सूरज ढलने से नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों में पैदा हुए भय, क्रोध और हिंसा से उतरता है।श्रीधर करुणानिधि की...
10/06/2026

📖 कभी-कभी अंधेरा सूरज ढलने से नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों में पैदा हुए भय, क्रोध और हिंसा से उतरता है।

श्रीधर करुणानिधि की कहानी ‘रात’ एक ऐसे गाँव की कथा है, जहाँ शाम के धुंधलके के साथ अचानक उठी चीख-पुकार पूरे माहौल को बेचैन कर देती है। हाट की दिशा से आती एक स्त्री की रुलाई, लोगों की बढ़ती भीड़, कानाफूसियाँ, आशंकाएँ और फिर घायल शंभू को देखकर फूट पड़ता मातृ-विलाप—ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं, जिसमें पाठक स्वयं उस तनावपूर्ण वातावरण का हिस्सा बन जाता है।

कहानी केवल एक घटना का विवरण नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि किस तरह सामाजिक तनाव, आपसी वैमनस्य और क्षणिक आवेश पूरे समुदाय को अपनी चपेट में ले लेते हैं। शंभू की माँ का दर्द, उसका क्रोध और न्याय की पुकार उस मानवीय पीड़ा को उजागर करती है, जो हिंसा के हर प्रसंग के पीछे छिपी रहती है।

✨ ‘रात’ एक मार्मिक और प्रभावशाली कहानी है, जो गाँव के जीवन, मानवीय संवेदनाओं और अंधेरे के कई रूपों को बेहद सजीव ढंग से हमारे सामने प्रस्तुत करती है।

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10/06/2026

भारत में क्रांति और प्रति- क्रांति - प्रभात पटनायक
#हिंदीभाषाकेप्रेमी

📖 युद्ध केवल मोर्चों पर नहीं लड़ा जाता, उसकी मार उन साधारण लोगों पर भी पड़ती है जिनकी आवाज़ इतिहास के पन्नों में अक्सर द...
10/06/2026

📖 युद्ध केवल मोर्चों पर नहीं लड़ा जाता, उसकी मार उन साधारण लोगों पर भी पड़ती है जिनकी आवाज़ इतिहास के पन्नों में अक्सर दब जाती है।

अलेक्ज़ेंडर आरोंशों के संस्मरण ‘फ़िलिस्तीन में तुर्कियों के साथ’ का यह अंश प्रथम विश्वयुद्ध के दौर की उस त्रासदी को सामने लाता है, जब सत्ता और सेना के नाम पर आम लोगों की गाड़ियाँ, पशु और यहाँ तक कि उनकी श्रमशक्ति भी छीन ली जाती थी। परिवारों से दूर भेजे गए लोग भूख, बीमारी और बेबसी का जीवन जीने को मजबूर थे, जबकि उनके परिजन उनकी सहायता के लिए संघर्ष कर रहे थे।

‘स्वेज़ अभियान’ केवल एक सैन्य अभियान की कहानी नहीं, बल्कि युद्ध, विस्थापन, शोषण और मानवीय पीड़ा का मार्मिक दस्तावेज़ है। येरूशलम की पवित्र गलियों में सैनिकों की आवाजाही और युद्ध की तैयारियों के बीच इतिहास का एक ऐसा चेहरा दिखाई देता है, जो हमें युद्ध की वास्तविक कीमत समझने पर मजबूर करता है।

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📖 एक रहस्यमय व्यक्ति, एक शांत गाँव और अतीत की अनकही परतें—यही है तय्यब सालिह के चर्चित उपन्यास ‘उत्तर की ओर गमन का मौसम’...
10/06/2026

📖 एक रहस्यमय व्यक्ति, एक शांत गाँव और अतीत की अनकही परतें—यही है तय्यब सालिह के चर्चित उपन्यास ‘उत्तर की ओर गमन का मौसम’ की दुनिया।

गाँव लौटे कथावाचक की मुलाकात मुस्तफ़ा सईद से होती है—एक ऐसा व्यक्ति जो कम बोलता है, अधिक सुनता है और अपने भीतर अनगिनत रहस्य समेटे हुए है। सामान्य दिखने वाले गाँव और साधारण-से लगने वाले लोगों के बीच मुस्तफ़ा की मौजूदगी लगातार जिज्ञासा पैदा करती है। उसके व्यक्तित्व की गहराई और उसके अतीत की अनकही कहानी धीरे-धीरे पाठक को अपनी ओर खींचती जाती है।

सूडानी साहित्य की इस कालजयी कृति में केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि पहचान, स्मृति, उपनिवेशवाद, संस्कृति और समाज के जटिल संबंधों का गहन चित्रण मिलता है। हर मुलाकात, हर संवाद और हर मौन के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी है जो पाठक को अंत तक बांधे रखती है।

✨ पढ़िए ‘उत्तर की ओर गमन का मौसम’ और प्रवेश कीजिए एक ऐसे साहित्यिक संसार में, जहाँ रहस्य, संवेदना और मानवीय मनोविज्ञान अद्भुत रूप से एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं।

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📚 प्रेमचंद केवल कथाकार नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज की गहरी अंतर्व्यथाओं को समझने वाले दूरदर्शी चिंतक भी थे।जाति, छुआछूत औ...
10/06/2026

📚 प्रेमचंद केवल कथाकार नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज की गहरी अंतर्व्यथाओं को समझने वाले दूरदर्शी चिंतक भी थे।

जाति, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव के प्रश्नों पर उन्होंने जिस निर्भीकता और संवेदनशीलता से लिखा, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। प्रेमचंद का मानना था कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति या धर्म नहीं, बल्कि उसकी मनुष्यता है। उन्होंने चेताया था कि छुआछूत और सामाजिक अन्याय केवल कुछ लोगों को नहीं, बल्कि पूरे समाज की बुनियाद को कमजोर करते हैं।

✍️ ‘मुई खाल की सांस सो सार भसम होय जाय’ में जितेन्द्र श्रीवास्तव प्रेमचंद की इसी मानवीय दृष्टि, सामाजिक सरोकार और दूरदर्शिता को रेखांकित करते हैं। यह आलेख बताता है कि प्रेमचंद का साहित्य केवल अपने समय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि आज के समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण नैतिक और वैचारिक मार्गदर्शक है।

📖 पढ़िए और समझिए कि प्रेमचंद आज भी सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की चर्चा में इतने प्रासंगिक क्यों हैं।

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🎓 Get Exam-Ready with NAAZ GUIDE for B.A. (Hons.) Entrance Examination!Authored by Dr. Fatima Zehra, NAAZ GUIDE is a com...
10/06/2026

🎓 Get Exam-Ready with NAAZ GUIDE for B.A. (Hons.) Entrance Examination!

Authored by Dr. Fatima Zehra, NAAZ GUIDE is a comprehensive resource designed for students aspiring to secure admission in the Faculties of Arts, Social Science, and Theology. Covering all key sections of the Combined Admission Test (CAT)—including English, Indo-Islamic & Aligarh Movement, General Awareness, Current Affairs, Reasoning, and Intelligence—this guide helps candidates prepare with confidence and clarity.

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📚 भारतीय साहित्य की विविध भाषाओं में रची गई महान काव्य परंपराएँ हमें यह एहसास कराती हैं कि संवेदना और भक्ति की कोई सीमाए...
10/06/2026

📚 भारतीय साहित्य की विविध भाषाओं में रची गई महान काव्य परंपराएँ हमें यह एहसास कराती हैं कि संवेदना और भक्ति की कोई सीमाएँ नहीं होतीं।

हिन्दी साहित्य में कृष्ण-भक्ति काव्य के शिखर कवि सूरदास हैं, जिनकी रचनाओं ने भक्ति, प्रेम और मानवीय भावनाओं को अद्वितीय ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। दूसरी ओर मलयालम साहित्य में चेरूश्शेरी का स्थान भी उतना ही गौरवपूर्ण है। जिस प्रकार सूरदास ने अपनी काव्य प्रतिभा से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया, उसी प्रकार चेरूश्शेरी ने ‘कृष्ण गाथा’ जैसी अमर कृति के माध्यम से मलयालम साहित्य को नई पहचान दी।

डॉ. के. वनजा का आलेख ‘सूर और चेरूश्शेरी’ दो महान कवियों के कृतित्व, उनकी काव्य-दृष्टि और भारतीय साहित्य में उनके योगदान का अत्यंत रोचक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह लेख बताता है कि अलग-अलग भाषाओं और सांस्कृतिक परिवेशों में रची गई काव्य परंपराएँ किस प्रकार एक साझा भारतीय चेतना से जुड़ी हुई हैं।

📖 पढ़िए ‘सूर और चेरूश्शेरी’ और जानिए हिन्दी तथा मलयालम साहित्य के दो महान कवियों की रचनात्मक विरासत, जिन्होंने अपनी अमर कृतियों से भक्ति साहित्य को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।

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📖 आत्मकथाएँ केवल किसी व्यक्ति की जीवनकथा नहीं होतीं, वे अपने समय, समाज और लोकजीवन का जीवंत इतिहास भी होती हैं।डॉ. तुलसीर...
10/06/2026

📖 आत्मकथाएँ केवल किसी व्यक्ति की जीवनकथा नहीं होतीं, वे अपने समय, समाज और लोकजीवन का जीवंत इतिहास भी होती हैं।

डॉ. तुलसीराम की चर्चित आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में ऐसे अनेक पात्र मिलते हैं, जो भले ही इतिहास की पुस्तकों में दर्ज न हों, लेकिन लोकस्मृति में आज भी जीवित हैं। बंकिया डोम ऐसा ही एक विलक्षण चरित्र है। बांस की टोकरियाँ बनाने वाला, सूअर पालने वाला और अपने कंधे पर सिंघा लटकाए गाँव-गाँव घूमने वाला यह व्यक्ति अपने अनोखे व्यक्तित्व के कारण पूरे इलाके में प्रसिद्ध था।

विवाह हो या मृत्युभोज, बंकिया डोम बिना निमंत्रण पहुँच जाता और अपने सिंघा की गूंज से माहौल भर देता। उसका सिंघा केवल एक वाद्ययंत्र नहीं था, बल्कि उसकी पहचान, उसकी आवाज़ और उसका सामाजिक अस्तित्व था। यदि किसी ने उसका अपमान किया या भोजन देने में कंजूसी दिखाई, तो वह अपने व्यंग्यपूर्ण और विद्रोही अंदाज़ में पूरे क्षेत्र में उस व्यक्ति की चर्चा कर देता। उसके शब्द और सिंघा की ध्वनि मिलकर ऐसी लोकघोषणा बन जाते थे, जो किसी की प्रतिष्ठा को रातोंरात प्रभावित कर सकती थी।

‘मुर्दहिया’ का यह प्रसंग केवल बंकिया डोम का चरित्र-चित्रण नहीं है, बल्कि ग्रामीण समाज की संरचना, लोकसंस्कृति, जातिगत यथार्थ और हाशिए पर खड़े लोगों की जीवटता का भी सशक्त दस्तावेज़ है। तुलसीराम की लेखनी इन पात्रों को केवल याद नहीं करती, बल्कि उन्हें पूरी संवेदना और जीवंतता के साथ हमारे सामने खड़ा कर देती है।

✨ पढ़िए ‘मुर्दहिया’ और जानिए उन लोगों की दुनिया, जिनकी कहानियाँ भारतीय समाज की वास्तविक धड़कनों को सुनाती हैं।

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📚 प्रेमचंद का साहित्य केवल कहानियों का संसार नहीं, बल्कि भारतीय समाज के अंतर्विरोधों और संघर्षों का सजीव दस्तावेज़ है।बी...
09/06/2026

📚 प्रेमचंद का साहित्य केवल कहानियों का संसार नहीं, बल्कि भारतीय समाज के अंतर्विरोधों और संघर्षों का सजीव दस्तावेज़ है।

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में जब जाति, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव भारतीय समाज की कठोर सच्चाई थे, तब प्रेमचंद ने इन प्रश्नों को गहरी संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टि से उठाया। उनके लिए मनुष्य की पहचान उसकी जाति या धर्म नहीं, बल्कि उसकी मनुष्यता थी। यही कारण है कि उन्होंने सामाजिक अन्याय, अस्पृश्यता और साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लगातार लेखन किया।

जितेन्द्र श्रीवास्तव का यह आलेख प्रेमचंद की उस दूरदर्शी सामाजिक दृष्टि को सामने लाता है, जिसमें वे केवल अपने समय की विसंगतियों को ही नहीं पहचानते, बल्कि उनके भविष्यगत परिणामों को भी समझते हैं। प्रेमचंद का विश्वास था कि स्वार्थ और भेदभाव पर आधारित कोई भी सामाजिक व्यवस्था अंततः स्वयं अपने विनाश का कारण बनती है।

📖 ‘मुई खाल की सांस सो सार भसम होय जाय’ के माध्यम से जानिए कि प्रेमचंद आज भी भारतीय समाज, राजनीति और मानवीय मूल्यों पर विमर्श के केंद्र में क्यों बने हुए हैं। उनकी दृष्टि हमें केवल अतीत नहीं, वर्तमान को समझने की भी राह दिखाती है।

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